चंडीगढ़ डीएसपी की आईपीएस पदोन्नति दावा खारिज करने के आदेश रद्द, केंद्र को तय समय में प्रस्ताव पर कार्रवाई के निर्देश

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Order rejecting Chandigarh DSP's claim for promotion

चंडीगढ़: Order rejecting Chandigarh DSP's claim for promotion, केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (कैट), चंडीगढ़ पीठ ने चंडीगढ़ पुलिस के उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) राम गोपाल द्वारा दायर मूल आवेदन को स्वीकार करते हुए वर्ष 2019 में जारी उन पत्राचारों को रद्द कर दिया है, जिनमें उनके भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में शामिल किए जाने के दावे पर विचार से इनकार किया गया था। यह कहते हुए दावा खारिज किया गया था कि चंडीगढ़ पुलिस का डीएसपी संवर्ग फीडर कैडर नहीं है। ट्रिब्यूनल ने चंडीगढ़ प्रशासन को दो सप्ताह के भीतर भर्ती नियम और संबंधित अभिलेख केंद्र सरकार को भेजने तथा केंद्र को अगले आठ सप्ताह में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।


यह आदेश न्यायिक सदस्य रमेश सिंह ठाकुर और प्रशासनिक सदस्य रश्मि सक्सेना साहनी की पीठ ने पारित किया। राम गोपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. शर्मा के साथ अधिवक्ता मनदीप सिंह पेश हुए। वहीं, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय गोयल के साथ अधिवक्ता पंकज खुराना, अधिवक्ता बी.बी. शर्मा तथा अधिवक्ता मुकेश कौशिक ने पक्ष रखा।


आवेदक ने 8 मई 2019, 28 जून 2019 और 14 अगस्त 2019 के उन पत्रों को रद्द करने की मांग की थी, जिनमें उनके आईपीएस में शामिल किए जाने के अनुरोध को खारिज किया गया था। आदेश के अनुसार, उन्होंने बताया कि उन्होंने 16 मार्च 1991 को सहायक उप निरीक्षक के रूप में सेवा शुरू की, 2 मार्च 1993 को उप निरीक्षक, 29 अक्टूबर 1998 को निरीक्षक और 22 फरवरी 2011 से डीएसपी पद पर पदोन्नत हुए, जिसे बाद में 1 जून 2009 से प्रभावी माना गया। उन्होंने दावा किया कि वह सबसे वरिष्ठ डीएसपी हैं, आठ वर्ष की अनिवार्य सेवा पूरी कर चुके हैं और आईपीएस (पदोन्नति द्वारा नियुक्ति) विनियम, 1955 के तहत सभी पात्रता शर्तें पूरी करते हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चंडीगढ़ पुलिस को आईपीएस में पदोन्नति के लिए फीडर कैडर माना जाना चाहिए और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।


प्रतिवादियों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आईपीएस (पदोन्नति द्वारा नियुक्ति) विनियम, 1955 आवेदक पर लागू नहीं होते। उनके अनुसार, चंडीगढ़ पुलिस में डीएसपी का पद एक पृथक पद है और आईपीएस (एजीएमयूटी कैडर) में शामिल किए जाने के लिए मान्यता प्राप्त फीडर कैडर नहीं है। उन्होंने गृह मंत्रालय के 25 अक्टूबर 2019 और 18 दिसंबर 2024 के पत्रों का हवाला दिया तथा आवेदक की आउट-ऑफ-टर्न पदोन्नति, विभागीय जांच और पुनः खोली गई आपराधिक जांच से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया।


दलीलों पर विचार करने के बाद ट्रिब्यूनल ने कहा कि अभिलेखों से स्पष्ट है कि आवेदक सबसे वरिष्ठ पात्र डीएसपी हैं और उन्होंने 31 मई 2017 को संवर्ग में आठ वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी। ट्रिब्यूनल ने यह भी नोट किया कि अंतरिम निर्देशों के बावजूद चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और मामले के निर्णय तक भी कोई हलफनामा दाखिल नहीं किया गया।
ट्रिब्यूनल ने माना कि आवेदक की शिकायत उचित है और कहा कि गृह मंत्रालय के 3 नवंबर 2020 के पत्र और बाद में अधिसूचित भर्ती नियमों के बावजूद आवश्यक कार्रवाई न करने से आवेदक के आईपीएस में शामिल किए जाने के मामले पर विचार का अधिकार प्रभावित हुआ है। इस प्रकार की प्रशासनिक देरी से वैधानिक अधिकार को नकारा नहीं जा सकता।
ट्रिब्यूनल ने आदेश में कहा कि 8 मई 2019, 28 जून 2019 और 14 अगस्त 2019 के वे आदेश, जिनमें यह कहते हुए दावा खारिज किया गया था कि डीएसपी संवर्ग फीडर कैडर नहीं है, रद्द किए जाते हैं।


ट्रिब्यूनल ने आगे निर्देश दिया कि चंडीगढ़ पुलिस के डीएसपी संवर्ग से संबंधित भर्ती नियम, प्रस्ताव और आवश्यक अभिलेख दो सप्ताह के भीतर केंद्र को भेजे जाएं। इसके बाद केंद्र सरकार को बिना अनावश्यक देरी के एजीएमयूटी कैडर की भारतीय पुलिस सेवा में डीएसपी संवर्ग को फीडर कैडर बनाने संबंधी प्रस्ताव पर कानून के अनुसार कार्रवाई करते हुए यथासंभव आठ सप्ताह में आदेश पारित करना होगा।


इसके बाद आवेदक के मामले पर आईपीएस (पदोन्नति द्वारा नियुक्ति) विनियम, 1955 और अन्य लागू प्रावधानों के अनुसार, पात्रता शर्तें पूरी होने पर विचार किया जाएगा।
ट्रिब्यूनल ने मूल आवेदन स्वीकार करते हुए किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई।